शौर्य गाथा


शौर्य गाथा

उसके लहू के कुछ कतरे हर एक कदम के साथ निशान बनाने में मशक्कत कर रहे थे । सूरज की तेज लपटें शरीर के कटे हुए हर एक अंग में हुए ज़ख्मों को भून रही थी और उन ज़ख्मों से पृथ्वी की छाती पर गिरे हुए हर लहू की बूँदें किसी लाल हीरे की तरह चमक रही थी ।
खून से लथपथ तलवार उसकी विजयगाथा का गुणगान कर रही थी लेकिन भूख से बिलखता हुआ पेट, जल की एक बूंद के लिए लालायित कंठ, रेगिस्तान की मृगचरिका, सिर पर मंडराते वहसी गिद्ध और सामने अपने अहंकार वश खड़ा सूखा वृक्ष चुनौती देने पर आमादा था । उसने अपनी तलवार को पूरी ताकत से वायु के वेग के साथ-साथ लहराकर अपनी उंगलियों से पकड़ को ढीला करते हुए जमीन की दिशा की ओर निर्देशित किया । तलवार ने तुरंत प्रचंडता दिखाते हुए पृथ्वी में सूखे की वजह से पड़ी दरारों में अपनी नोंक को सघन मिट्टी में स्थानक प्राप्त किया । इस प्रचंड आघातवश तलवार से कम्पन्नता की मद्धम सी ध्वनि उत्पन्न हुई जो पूरे वातावरण में फैलती गयी तथा गिद्धों ने ध्वनि तरंगों की पीड़ावश अपने मार्ग की दिशा बदल ली ।
वह जमीन पर अपने घुंटनों के बल बैठकर सूखे वृक्ष की ओर एक आस लगाए एकटक देखे जा रहा था । तभी कहीं दूर आकाशीय बिजली की चमक ने उसके आत्मविश्वास में एक नई जान फूंक दी । उसने अपना युद्ध कवच उतारकर फेंका और उन बादलों की ओर दौड़ने लगा । तेज हवाओं ने अपने वेग मे तीव्र परिवर्तन करते हुए उसके मार्ग में प्रतिरोध उत्पन्न करने की कोशिशें जारी रखी किन्तु उसके हौसलों में इतना बारूद भरा था कि हवाओं ने हार मानना ही उचित समझा ।
वह उन काले मेघों के ठीक नीचे मूर्छित एवं निढाल अवस्था में बंजर भूमि की गोद में सोया हुआ उन मेघों को निहारने लगा । बिजली की गर्जना पुनः उसके कर्णपटल पर अवशोषित हुई । बारिश की बूंदे उसके शरीर को भिगोने लगी । यकायक एक बारिश की बूँद ने उसकी प्यास को शिथिल किया किन्तु बारिश का प्रलय निरंतर जारी रहा ।


लेखक - प्रशांत पंचोले
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