गुरुत्वाकर्षण की खोज करने की भी एक अजीब कहानी है। सिर्फ एक सेब की वजह से गुरुत्वाकर्षण की खोज हुई थी। न्यूटन जब सेब के पेड़ के नीचे बैठे हुए कुछ कार्य कर रहे थे तब उनके ऊपर एक सेब आ गिरा और इसके बाद तो पूरी दुनिया जानती है की न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दिया था। वैसे अगर गणना की जाए कि मनुष्य कितना गुरुत्वाकर्षण बल सहन कर सकता है तो कईं निष्कर्ष सामने आएंगे।
गुरुत्वाकर्षण बल
जब कोई ग्रह, तारा या अन्य अंतरिक्षीय पिंड अपने केंद्र की ओर चीजों को खींचता है तब वहां पर गुरुत्वाकर्षण बल कार्य करता है और इसी खिंचाव को गुरुत्वाकर्षण बल कहते है। जैसे - गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही सारे ग्रह सूर्य की कक्षा में चक्कर लगाते हैं।
जब कोई प्राणी उछलता है तब वह पृथ्वी की सतह पर वापस आ जाता है। ऐसा सिर्फ जीवित प्राणियों में ही नहीं होता है। पृथ्वी पर मौजूद हर एक चीज गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही अपने स्थानों पर व्यवस्थित है। हर वह चीज जिसका कोई द्रव्यमान हैं उसका अपना गुरुत्वाकर्षण बल होता है। जिसका जितना द्रव्यमान होगा उसका उतना ही गुरुत्वाकर्षण बल होगा। गुरुत्वाकर्षण बल दुरी के साथ-साथ घटता और बढ़ता है। पृथ्वी पर मौजूद हर एक चीज का वजन भी इसी गुरुत्वाकर्षण बल की दें है। अन्य ग्रहों पर आपका भार भी गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से घटेगा और बढ़ेगा।
गुरुत्वाकर्षण ही एक मात्र संसाधन है जिस वजह से हम लोग सूर्य से एक निश्चित दुरी पर स्थित है और इस वजह से सूर्य की गरमाहट का आनंद ले पाते हैं। इसकी वजह से ही पृथ्वी का वातावरण अब तक संतुलित स्थिति में सांस लेने योग्य बना हुआ हैं।
न्यूटन के सूत्र
इस सूत्र में
F - Force ( बल )
G - Gravity ( गुरुत्वाकर्षण )
m - Mass ( द्रव्यमान )
और
r - Radius ( त्रिज्या )
को दर्शाते हैं।
दूसरे ग्रहों और पृथ्वी की तुलना में गुरुत्वाकर्षण बल कितना सहायक सिद्ध हो सकता है।
यदि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ने लगे तो मनुष्य कितना बल सहन कर सकेगा ? वैसे यह तो संभव नहीं है किन्तु मनुष्य किसी दूसरे ग्रह पर जाए तो क्या वह वहां के वातावरण और गुरुत्वाकर्षण बल अनुसार जीवित रह पाएगा ? कईं हद तक नहीं। अन्य ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी की तुलना में अधिक है या कम है। मनुष्य ने चाँद और मंगल ग्रह पर रहने की सोच रहा हैं क्योंकि वहां का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी से कम है।
कईं बड़े-बड़े दूरबीनों ने कईं ग्रहों की खोज की और कईं ऐसे ग्रहों की भी खोज की जहां पर जीवन अनुकूल वातावरण उपलब्ध है। लेकिन फिलहाल मनुष्य वहां नहीं पहुँच सकता। लेकिन यदि कल्पना की जाए उन ग्रहों तक जाकर मनुष्य जीवन बसाने की तो क्या वहां का गुरुत्वाकर्षण बल मनुष्य को जीवित रख पाएगा ? शायद नहीं, क्योंकि मनुष्य की शारीरिक संरचना पृथ्वी के वातावरण के अनुकूल बनी हुई है। इसके अतिरिक्त यदि मनुष्य एक ऐसा ग्रह खोज ले जहां पर जीने योग्य खनिजों की मात्रा संतुलित हो तो वहां फिलहाल की स्थिति अनुसार जाना संभव नहीं है लेकिन वहां पर जाना संभव हुआ तो क्या वहां के गुरुत्वाकर्षण बल के अनुसार मनुष्य अपने आप को ढाल पाएगा? ऐसा भी हो सकता है की अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से हमारे पैरों के निचले हिस्सों से रक्त प्रवाहित होने लग जाए, हमारी हड्डियां टूटकर बिखर जाए और ये भी हो सकता है की हम वहीं उस ग्रह की सतह के अंदर धँस जाएं? कईं और अनंत संभावनाएं हमारे समक्ष प्रस्तुत हो सकती है।
अन्य ग्रहों पर जाने से पहले वैज्ञानिकों को मनुष्य के शरीर की क्षमता को नाप लेना चाहिए की एक सामान्य मनुष्य का शरीर कितना गुरुत्वाकर्षण बल सहन कर सकता है। कुछ अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार मनुष्य पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से सिर्फ चार या पाँच गुना अधिक ही गुरुत्वाकर्षण बल सहन कर सकता है।
गुरुत्वाकर्षण बल
जब कोई ग्रह, तारा या अन्य अंतरिक्षीय पिंड अपने केंद्र की ओर चीजों को खींचता है तब वहां पर गुरुत्वाकर्षण बल कार्य करता है और इसी खिंचाव को गुरुत्वाकर्षण बल कहते है। जैसे - गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही सारे ग्रह सूर्य की कक्षा में चक्कर लगाते हैं।
जब कोई प्राणी उछलता है तब वह पृथ्वी की सतह पर वापस आ जाता है। ऐसा सिर्फ जीवित प्राणियों में ही नहीं होता है। पृथ्वी पर मौजूद हर एक चीज गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही अपने स्थानों पर व्यवस्थित है। हर वह चीज जिसका कोई द्रव्यमान हैं उसका अपना गुरुत्वाकर्षण बल होता है। जिसका जितना द्रव्यमान होगा उसका उतना ही गुरुत्वाकर्षण बल होगा। गुरुत्वाकर्षण बल दुरी के साथ-साथ घटता और बढ़ता है। पृथ्वी पर मौजूद हर एक चीज का वजन भी इसी गुरुत्वाकर्षण बल की दें है। अन्य ग्रहों पर आपका भार भी गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से घटेगा और बढ़ेगा।
गुरुत्वाकर्षण ही एक मात्र संसाधन है जिस वजह से हम लोग सूर्य से एक निश्चित दुरी पर स्थित है और इस वजह से सूर्य की गरमाहट का आनंद ले पाते हैं। इसकी वजह से ही पृथ्वी का वातावरण अब तक संतुलित स्थिति में सांस लेने योग्य बना हुआ हैं।
न्यूटन के सूत्र
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| न्यूटन द्वारा प्रतिपादित गुरुत्वाकर्षण बल का सूत्र |
इस सूत्र में
F - Force ( बल )
G - Gravity ( गुरुत्वाकर्षण )
m - Mass ( द्रव्यमान )
और
r - Radius ( त्रिज्या )
को दर्शाते हैं।
दूसरे ग्रहों और पृथ्वी की तुलना में गुरुत्वाकर्षण बल कितना सहायक सिद्ध हो सकता है।
यदि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ने लगे तो मनुष्य कितना बल सहन कर सकेगा ? वैसे यह तो संभव नहीं है किन्तु मनुष्य किसी दूसरे ग्रह पर जाए तो क्या वह वहां के वातावरण और गुरुत्वाकर्षण बल अनुसार जीवित रह पाएगा ? कईं हद तक नहीं। अन्य ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी की तुलना में अधिक है या कम है। मनुष्य ने चाँद और मंगल ग्रह पर रहने की सोच रहा हैं क्योंकि वहां का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी से कम है।
कईं बड़े-बड़े दूरबीनों ने कईं ग्रहों की खोज की और कईं ऐसे ग्रहों की भी खोज की जहां पर जीवन अनुकूल वातावरण उपलब्ध है। लेकिन फिलहाल मनुष्य वहां नहीं पहुँच सकता। लेकिन यदि कल्पना की जाए उन ग्रहों तक जाकर मनुष्य जीवन बसाने की तो क्या वहां का गुरुत्वाकर्षण बल मनुष्य को जीवित रख पाएगा ? शायद नहीं, क्योंकि मनुष्य की शारीरिक संरचना पृथ्वी के वातावरण के अनुकूल बनी हुई है। इसके अतिरिक्त यदि मनुष्य एक ऐसा ग्रह खोज ले जहां पर जीने योग्य खनिजों की मात्रा संतुलित हो तो वहां फिलहाल की स्थिति अनुसार जाना संभव नहीं है लेकिन वहां पर जाना संभव हुआ तो क्या वहां के गुरुत्वाकर्षण बल के अनुसार मनुष्य अपने आप को ढाल पाएगा? ऐसा भी हो सकता है की अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से हमारे पैरों के निचले हिस्सों से रक्त प्रवाहित होने लग जाए, हमारी हड्डियां टूटकर बिखर जाए और ये भी हो सकता है की हम वहीं उस ग्रह की सतह के अंदर धँस जाएं? कईं और अनंत संभावनाएं हमारे समक्ष प्रस्तुत हो सकती है।
अन्य ग्रहों पर जाने से पहले वैज्ञानिकों को मनुष्य के शरीर की क्षमता को नाप लेना चाहिए की एक सामान्य मनुष्य का शरीर कितना गुरुत्वाकर्षण बल सहन कर सकता है। कुछ अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार मनुष्य पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से सिर्फ चार या पाँच गुना अधिक ही गुरुत्वाकर्षण बल सहन कर सकता है।

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