ये शहर सोता नहीं हैं...
ये शहर कभी सोता क्यूँ नहीं ? शायद मुझे भी नहीं पता और शायद आपको भी नहीं , किन्तु यहाँ शब्दों पर ध्यान देना उचित होगा , " ये शहर सोता क्यों नहीं ? " क्या कुछ ख्वाब हैं इसके जिन्हें पूरा करने में ये दिन - रात कड़े परिश्रम मे लगा रहता हैं , जागता रहता हैं । अब ये शहर कोई प्राणी तो हैं नहीं जो हर वक़्त परिश्रम में अपना वक़्त ज़ाया किया करे । दरअसल इस शहर में लाखों लोग रहते हैं, उनके कुछ ख़्वाब होते है । उन्हीं ख्वाबों को पूरा करने के लिए इस शहर के लोग मेहनत में मशरूफ रहते है जो अधिकांशतः सो नहीं पाते है । इसी वजह से ये शहर भी सो नहीं पता हैं ।
इस शहर में कई नौजवान अपने वजूद से दूर होकर समंदर की लहरों के साथ क्षितिज की गहराइयों में अपने ज़मीर को खोजते नजर आते है । वैसे इस शहर के कई वजूद है, कई पेशे है और कई महत्वपूर्ण सितारे भी रहते हैं । जी हाँ, सितारे केवल आसमानों में ही नहीं रहते, यहाँ इस शहर में भी रहते हैं , जो की इंसान हैं । उनके भी कई ख्वाब् हैं जो सिर्फ खुली आँखों से ही देखकर पुरे होते है इसीलिए ये शहर जागता रहता हैं ।
इस शहर के कई रंग हैं और इसका मिजाज़ भी रंगीन है । ये अपने मिजाज़ में भी रुबाब रखता हैं । हर किसीको ये अपने दिल में नहीं रखता । हर किसीको ये चैन से सोने भी नहीं देता क्योंकि ये शहर भी कभी सोता नहीं है , लेकिन जो सोता नहीं है वही इसके दिल के करीब होता है । इस शहर के लोग दिलचस्प होते है लेकिन थोड़े अजीब भी होते है । कौन युवक है और कौन युवती ये जानने के लिए अपनी आँखों की पुतलियों को सिकुड़ कर सामने खड़ी शख्सियत को एकाग्रचित्त होकर देखना पड़ता है । ये शहर हमेशा वक़्त के पहिये की रफ़्तार के साथ अपनी रफ़्तार समानांतर बनाये रखता है ।
हाँ इस शहर में चकाचौंध है, आकर्षण है, दिल को प्रफुल्लित करने वाले नज़ारे है । नौजवान युवक - युवतियों के दिलों में कई ख़्वाबों को अपने साथ लिए ये चलता है और प्रतिभाओं का कोयला यहाँ अंगार बनके दहकता हैं । यहाँ कोई संघर्षकर्ता ( struggler ) ऐसा होता हैं जिसकी कहानियां अंतर्मन को बुरी तरह झकझोरने वाली एवं तिलमिला देने वाले विचारों की ओर ले जा , गहरी बेचैनी प्रदान करने वाली कड़वी सच्चाई रुपी विष के समान होती है तो दूसरी ओर कोई पस्त होकर इस शहर को अपने दिल से बेदखल कर देता है लेकिन जब इंसान अपने फैसले खुद करता है तो, उसे बदलने का भी हक़ होता है ।
वैसे इस लेख के शुरूआती शब्द समंदर के किनारे पर थे वहीँ से आगे बढ़ता हूँ की जब यहाँ कोई आकर समंदर की लहरों को देखता है तो लहरें एक दूसरे के साथ अठखेलियां करती हुयी प्रतीत होती है । पहली लहर जब किनारों को छूती है तो दूसरी लहर शोर मचाती हुयी पहली लहर को अपने साथ लेकर फैलाते हुए सुखी रेत को अपने में समेटते हुए बाद वाली लहर के साथ छिन्न भिन्न हो जाती हैं । कुछ ऐसी ही इस शहर ज़िन्दगी जीने की कला है । इस शहर में पहले अवसर को ही अपना सबसे बेहतर योगदान देना होता है नही तो दूसरी लहर शोर मचाती हुयी सबकुछ छिन्न भिन्न करती हुयी आ ही रही हैं । क्योंकि " ये शहर कभी सोता नहीं हैं ।"
जय हिन्द ।।।
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