उल्का पिण्ड
अंतरिक्ष में इधर-उधर विचरण करने वाले छोटे-छोटे पिंडों को उल्का पिंड कहा जाता है।
यह उल्का पिंड हमारे सौरमंडल में किसी चीनी व्यक्ति के दाढ़ी के बाल बराबर की हिस्सेदारी ही रखता है। वैसे तो यह उल्का पिंड अपनी दिशा में ही चल रहा है लेकिन यह उल्का पिंड यदि अपनी दिशा को पृथ्वी की ओर परिवर्तित कर लेता तो महाप्रलय आने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती। इसलिए वैज्ञानिकों ने इसकी पृथ्वी से टकराने की कुछ प्रतिशत संभावना आंकना उचित समझा।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की सेंटर फॉर नियर अर्थ स्टडीज के अनुसार यह उल्का पिंड फिर लौटकर आएगा सन 2079 में। तब यह उल्का पिंड पृथ्वी के सबसे नजदीक होगा और इसे नग्न आँखों से भी देखा जा सकेगा। मतलब की पृथ्वी से देखने पर इसका आकार शुक्र ग्रह जितना दिखाई देगा। हालांकि यह उल्का पिंड फिलहाल तो अपने गंतव्य की ओर जा चूका है इसलिए इससे किसी भी प्रकार का कोई खतरा पृथ्वी वासियों के लिए नहीं है।
उल्का पिंडों की खोज
सन 1781 में यूरेनस (अरुण ग्रह) की खोज के बाद खगोलविदों ने अपनी खोजों को जारी रखते हुए सन 1801 के बाद कईं खगोलीय पिंडों की खोज की। उनके अनुसार मंगल ग्रह और बृहस्पति ग्रह के बीच में एक उल्का पिंडों की श्रृंखला मौजूद है, जिसे बाद में एस्टोरॉइड बेल्ट नाम दिया गया। इसी बेल्ट में से अधिकतर छोटे-छोटे उल्का पिंड पृथ्वी के वातावरण में आकर नष्ट हो जाते हैं। इनमे से कईं ऐसे भी उल्का पिंड है जो काफी खतरनाक है। उन्हीं में से 29 अप्रैल 2020 को भारतीय समयानुसार दोपहर 3.30 पृथ्वी के नजदीक से जाने में सफल रहा। इस उल्का पिंड से भी अधिक खतरनाक उल्का पिंडों पर नासा के द्वारा अध्ययन किया जा रहा है। ताकि निकट भविष्य में पृथ्वी पर किसी प्रकार का कोई खतरा ना मंडराए।




1 टिप्पणियाँ
Nice
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