नए अध्ययनों से ज्ञात हुआ है की एक विशाल तारे ने अपने पडोसी तारे को निगल लिया।



लेखक : प्रशांत पंचोले 

कल्पना कीजिए की हमारे सूर्य को कोई दूसरा तारा एक रोटी की तरह चबाकर खा रहा है। वैसे यह एक अकल्पनीय घटना है लेकिन ब्रह्माण्ड में एक तारा ऐसा है जिसने अपने पडोसी तारे को तहस-नहस कर के अपने अंदर समाहित कर लिया है। जी हाँ, आपने सही पढ़ा, वर्ष 2006 में नासा के वैज्ञानिकों और खगोलविदों को अब तक के सबसे चमकीले और बहुत बड़े सुपरनोवा को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यह खगोलविदों की कड़ी मेहनत और दिन-रात किए जा रहे प्रयासों से संभव हुआ था। उस सुपरनोवा विस्फोट की रोशनी हमारे सूर्य से 50 बिलियन गुना अधिक थी लेकिन फिर भी उस समय वे लोग उस सुपरनोवा की इतनी अधिक भयावहता का कारण पता करने में विफल हो गए थे।

हाल ही के अध्ययनों से विदित हुआ की वह विशालकाय और भयावह सुपरनोवा विस्फोट की वजह उस तारे के समीप ही स्थित एक छोटा और मृत तारा था। कैसे वह वजह बना, हम आपको बताते है।

खगोलविदों ने पृथ्वी से लगभग 240 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित पारस नक्षत्र में एक चमकीली रोशनी की खोज की इसका अधिक अध्ययन करने पर पता चला की यह एक सुपरनोवा विस्फोट है जिसकी वजह से लगभग 100 दिनों तक उस सुपरनोवा की अपनी स्वयं की आकाशगंगा में चमकना जारी रहा और वह चमक लगातार बढ़ती ही गई। उस वक़्त खोजा गया सबसे शक्तिशाली और अत्यधिक चमकीला सुपरनोवा यही था। इस घटना के  दशक बाद वैज्ञानिक उसकी भयानकता का पाएं हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होनें सुपरनोवा विस्फोट से लगभग एक वर्ष बाद विस्फोट से निकलने वाली रहस्यमयी उत्सर्जित रेखाओं और तरंगों का विश्लेषण किया। उन लोगों ने इन रेखाओं और तरंगों के अध्ययन में यह पाया की वहां अत्यधिक मात्रा में लोहा मौजूद है। खगोलविदों यह भी पता लगाया की किसी स्थान पर या तरंगों में अत्यधिक लोहा होना इस ओर इशारा करता है की वह तारा सुपरनोवा बन रहा था तब उसके समीप मौजूद किसी दूसरे सैकड़ों वर्ष किसी पुराने तारे के साथ जुड़ने की कोशिश की परन्तु इस कोशिश में पडोसी तारा भी सुपरनोवा की चपेट में आ गया। इसको समझना वैसा ही है जैसे किसी डूबते हुए को तिनके का सहारा। इसलिए खगोलविदों ने निष्कर्ष निकाला की जो संकेत सुदूर अंतरिक्ष से आ रहे थे वे किसी एक तारे से नहीं बल्कि दो तारों के सुपरनोवा विस्फोट में नष्ठ होने की वजह से आ रहे हैं।

" एक शोधकर्ता ने बताया की यह एक प्रकार की पुराने तारों को फिर से जीवित करने की प्रणाली है जिसमे एक विशालकाय तारा और एक छोटा बौना तारा होता है जो विशालकाय तारे का सर्पाकार चक्कर लगाता है।" दो तारों की टक्कर बहुत ही दुर्लभ होती है। जब भी दो तारों का टकराव होता हैं तब टकराव के आस-पास के अंतरिक्ष में उन तारों के टकराने से जो कचरा बचता हैं उसकी वजह से वहां पर बादलों का निर्माण हो जाता हैं क्योंकि दोनों तारे आपस में धीरे-धीरे विलय हो रहे होते हैं। हमारी आकाशगंगा में ऐसा लगभग 10,000 से 12,000 हजार सालों में एक या दो बार ही होता है।

यदि इस प्रकार की टक्कर सुपरनोवा के बनने से 200 साल या 300 साल पहले हुई होती तो वहां वातावरण में आस-पास गैसों के बादल बन गए होते और अगली सदी में वे और भी अत्यधिक चमकीले होना शुरू हो जाते। जब यह प्रक्रिया सुपरनोवा में परिवर्तित हो जाती तब वहां मौजूद गैसों के बादलों में अत्यधिक चमकीलापन और लोहे का उत्सर्जन भी शोधकर्ताओं को मिलता। 
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