लेखक - प्रशांत पंचोले
अब तक नासा के द्वारा ज्ञात आंकड़ों से यह पता चलता हैं की वैज्ञानिकों के द्वारा लगभग चार हजार से अधिक ग्रहों को ढूंढ लिया गया हैं लेकिन इनमें से कुछ ही ग्रह ऐसे मिले जो अपने तारे के रहने योग्य क्षेत्र में स्थित हैं और उनमें से भी कुछ ग्रह ऐसे हैं जो अपनी धुरी पर घूर्णन ही नहीं करते। कुछ ग्रह ऐसे भी मिले जो सिर्फ एक ही तारे का चक्कर नहीं लगाते है जबकि दो या दो से अधिक तारों का चक्कर लगाते हैं। यदि पृथ्वी के 365 दिनों की तुलना कुछ ग्रहों से की जाए तो वे ग्रह अपने तारे के इतने समीप होते हैं कि एक चक्कर लगाने में केवल कुछ दिन लगते हैं। पृथ्वी अपने तारे सूर्य से वृत्ताकार परिक्रमा करती है वहीँ अन्य ग्रहों के बारे में वैज्ञानिकों ने जब खोजबीन की तब उन्हें लम्बाकार कक्षा में परिक्रमा करते हुए भी कईं ग्रह मिले। जब यह बात आती है कि सौरमंडल के बाहर के ग्रह कैसे व्यवहार करते हैं और वे कहां मौजूद हैं, तो कई संभावनाएं प्रकट होती हैं।
और फिर भी, जब ग्रहों के आकार की बात आती है, विशेष रूप से उनके द्रव्यमान और त्रिज्या की, तो उनकी कुछ सीमाएं भी हैं। यदि हम इसका दोष किसी को देना चाहें तो हम भौतिकी को पूरी तरह से गुनहगार ठहरा सकते हैं।
कुछ दिनों पहले नेटली हिंकल जो की एक खगोल वैज्ञानिक है, ने अपने एक लेख में बताया की ' मैं यह समझने कोशिश करती हूँ की एक ग्रह अपने स्वयं के वातावरण में ऐसा क्या करता है जिससे वहां पर जीवन पनप सकता हैं। तारों और ग्रहों के रासायनिक संबंधों को भी ध्यान में रखना पड़ता है और विभिन्न आकार के ग्रहों की आंतरिक संरचना और उस ग्रह पर मौजूद खनिज पदार्थ कैसे एक दूसरे में तुलना प्रदर्शित करते हैं।'
अब तक की खोजों से यह प्राप्त हुआ है की खगोलविदों को सिर्फ दो ही प्रकार के ग्रह मिलें हैं और हमारे सौरमंडल में दो प्रकार के ग्रह हैं, छोटे, पथरीले और हमारी पृथ्वी की तरह और दूसरे गैसीय ग्रह जैसे की बृहस्पति, शनि, और अरुण ग्रह। गैसीय ग्रह होने का यह तात्पर्य बिलकुल भी नहीं है की वहां पर सिर्फ गैस ही हैं, उनकी भी सतह है परन्तु अत्यधिक गैसें वातावरण में होने की वजह से सतह का अंदाजा लगाना लगभग मुश्किल और नामुमकिन सा हो गया है। अतः खगोलविदों के मतानुसार यह मन गया की ब्रह्माण्ड में ग्रहों की श्रेणियां केवल दो प्रकार की है है।
जब हम ग्रहों को ढूंढ़ने वाले केपलर मिशन और ट्रांज़िटिंग एक्सोप्लेनेट सिस्टम सैटेलाइट (TESS) जैसे मिशनों के आंकड़ों का अध्ययन करते है तो पाते हैं की ग्रहों के आकारों में बहुत ही अधिक अंतर पाया जाता है। कईं आंकड़ों से यह ज्ञात होता है की पाए गए ग्रहों की त्रिज्या पृथ्वी से दुगुनी या डेढ़ गुनी अधिक है वहीं द्रव्यमान भी पाँच से दस गुना अधिक नापा गया। इसलिए यह ग्रह एक उत्तम प्रकार की पृथ्वी को परिभाषित नहीं करते हैं। तो अब सवाल यह उठता है की क्या बाहरी अंतरिक्ष में कोई पृथ्वी जैसा ग्रह है? क्यूँ खगोलविदों को सिर्फ पथरीले और गैसीय ग्रह मिलते हैं?
जब कोई ग्रह जन्म ले रहा होता हैं तब कईं मामलों में ग्रह पर उसके तारे के अनुसार वातावरण बनना शुरू हो जाता है एक यही कारण है की अब तक सिर्फ दो तरह के ही ग्रह मिले है जिस वजह से एक उत्तम पृथ्वी की अवधारणा करना लगभग कम ही रहती है।
जब एक तारे का जन्म होता है, तब गैसों के बादल बनना शुरू होते हैं। दूर से देखने पर वे बादलों की गेंद जैसे दिखाई देते हैं। वह गैसों के बादल घूमना शुरू करते है, अपने आप में बिखर जाते हैं और तारे के मुख्य भाग के भीतर एक संलयन प्रतिक्रिया प्रज्वलित होती है। यह प्रक्रिया यहीं पर समाप्त नहीं होती है, तारे के जन्म लेने के बाद बहुत सारी गैस और धुल रह जाती है जो की तारे के इर्द-गिर्द चक्कर लगाती रहती हैं। यही चक्कर लगाती हुई गैसें और धुल आगे भविष्य में ग्रहों का निर्माण करती हैं। जैसे-जैसे ग्रहों बढ़ने लगता है वैसे-वैसे इसका द्रव्यमान और इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी बढ़ती जाती हैं। जिस कारण ग्रहों पर धुल, चट्टानें विकसित तो होती ही हैं साथ ही साथ गैसें भी ग्रहों के वातावरण में अपनी पकड़ मजबूत कर लेती है।
एक तारे में बहुत सारी गैसें होती हैं जिनमें से हाइड्रोजन और हीलियम बहुतायत में पाई जाती है, यहां तक की ब्रह्माण्ड में भी यह दोनों गैसें सबसे अधिक पाई जाती हैं।
उत्तम पृथ्वी बनने या मिलने की समस्या
यदि कोई ग्रह अपेक्षाकृत छोटा रहता है, जिसकी त्रिज्या पृथ्वी की त्रिज्या से 1.5 गुना कम है, तब इसका गुरुत्वाकर्षण पर्याप्त मात्रा में वायुमंडल पर पकड़ बनाने के लिए मजबूत नहीं है। यदि, यह लगातार बढ़ता रहता है, तो यह अधिक से अधिक गैसों को अपनी ओर आकर्षित करेगा जिससे एक ऐसा वातावरण बनता है जो इसे नेपच्यून के आकार (चार गुना पृथ्वी के त्रिज्या) या बृहस्पति के आकार का बनाता है, जो पृथ्वी के त्रिज्या का 11 गुना अधिक है।
इसलिए ग्रह पथरीला और छोटा विकसित होगा या बहुत बड़ा गैसीय पिंड में बदल जाएगा। और इन दोनों प्रकारों के ग्रहों के मध्य में पृथ्वी जैसा एक उत्तम ग्रह बन सकता हैं लेकिन इसकी संभावना बहुत ही कम होती है क्योंकि एक बार जब यह पर्याप्त द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण बना लेता है, तब इसमें उचित परिस्थितियों की आवश्यकता होती हैं ताकि गैसों का बढ़ना रोक सके और जीवन को पनपने का जरिया बना सके।
विचार करने के लिए एक और कारक यह है कि एक बार एक ग्रह बनने के बाद, यह हमेशा एक ही कक्षा में नहीं रहता है। कभी-कभी ग्रह अपने मेजबान तारे की ओर बढ़ते हैं या पलायन करते हैं। जैसे-जैसे ग्रह तारे के करीब आता है, इसका वायुमंडल गर्म होता है जिससे परमाणु और अणु बहुत तेजी से आगे बढ़ते हैं और ग्रह के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से बच जाते हैं।
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